बाघ प्रिंट को करीब से देखने पर एक फूल, एक बेल या एक जाली बार-बार लौटती है। धार जिले के बाघ में यह दोहराव लकड़ी के तराशे हुए ठप्पों से बनता है। कारीगर कपड़े पर हर छाप हाथ से लगाता है; पूरा डिजाइन ऐसे ही आगे बढ़ता है।

छपाई शुरू होने से पहले कपड़े की तैयारी होती है। हस्तशिल्प विभाग के विवरण में धुलाई और भिगोने के साथ अरंडी का तेल, नमक तथा अन्य पारंपरिक सामग्री का इस्तेमाल दर्ज है। तैयार कपड़ा रंग और छाप ग्रहण करने लायक बनाया जाता है।

लाल और काले के पीछे की मेहनत

विभाग के मुताबिक फिटकरी या लौह लवण से बने छपाई मिश्रण इस्तेमाल किए जाते हैं। एलिजरिन और धवई के फूलों के साथ उबालने की प्रक्रिया रंग विकसित करती है। बहते पानी में धुलाई से अतिरिक्त रंग निकालने का काम भी होता है।

मध्यप्रदेश पर्यटन में 2022 को प्रकाशित विवरण में कारीगर गुरु दत्त काटे ने बताया था कि छपाई के बाद कपड़ा दस से पंद्रह दिन सूखने के लिए रखा जाता है। उन्होंने धुलाई में बहते पानी की भूमिका भी समझाई थी।

फूलों और ज्यामितीय जालियों वाली यह छपाई अब साड़ी-दुपट्टे तक सीमित नहीं है। हस्तशिल्प विभाग कुशन कवर, पर्दे और टेबल रनर भी इसके उत्पादों में गिनाता है। कपड़े का इस्तेमाल बदलता है, लेकिन ठप्पे से छपाई की पहचान बनी रहती है।

स्रोत और संदर्भ

  1. विकास आयुक्त हस्तशिल्प, भारत सरकार · Bagh Prints of Madhya Pradesh ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
  2. मध्यप्रदेश पर्यटन · The Heritage Weave Of Maheshwar And The Prints Of Bagh ↗8 दिसंबर 2022
  3. भारत सरकार, पर्यटन मंत्रालय · Bagh Prints of Madhya Pradesh ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं

सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 15 सितंबर 2026।