हवा दिखाई नहीं देती, फिर उसकी तस्वीर कैसे बने? पाटनगढ़ के कलाकार मोहन सिंह श्याम ने उसके लिए फैलते हुए गोल घेरे चुने थे। एक दूसरी पेंटिंग में रास्ता और उस पर पैरों के निशान थे। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अभिलेखीय परिचय में उनकी इन दो कृतियों का जिक्र मिलता है।
जंगढ़ सिंह श्याम ने ये चित्र उज्जैन के अखिल भारतीय कालिदास समारोह के लिए चुने थे। मोहन के चित्रों की कल्पना उनके गांव के अनुभवों से जुड़ी थी—पक्षी, जानवर और आसपास की दुनिया।
एक हिरनी के भीतर दूसरी जिंदगी
केंद्र की ऑनलाइन गैलरी में कागज पर ऐक्रेलिक से बनी उनकी एक कृति गर्भवती हिरनी को दिखाती है। लाल शरीर के भीतर बच्चा और ऊपर पीठ पर पक्षी हैं। शरीर की बनावट छोटे-छोटे रंगीन पैटर्न से भरी है। गैलरी उस चित्र का विषय भी स्पष्ट दर्ज करती है।
मोहन के परिचय में मां राजा बाई के साथ घर की दीवारों पर चित्र बनाने की शुरुआत का उल्लेख है। यह काम त्योहारों से जुड़ा था। बाद में चित्रों के लिए कागज और प्रदर्शनी का दायरा जुड़ा।
डिंडौरी जिला प्रशासन पाटनगढ़ को पीढ़ियों के बीच आगे बढ़ती गोंड चित्रकला की परंपरा से जोड़ता है। मोहन का अभिलेख उस परंपरा में एक व्यक्ति की कल्पना को पहचानने का मौका देता है। हर चित्र के साथ कलाकार का नाम और विषय पढ़ने पर उसके बारे में समझ और गहरी होती है।
स्रोत और संदर्भ
- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र · Mohan Singh Shyam — Gond Artist of Madhya Pradesh ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र · Paintings by Mohan Singh: Pregnant doe with birds feeding off her back ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
- डिंडौरी जिला प्रशासन · Culture & Heritage: Patangarh Paintings ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 15 सितंबर 2026।



